Wednesday, 31 August 2011

गुजर गए कि कोई मोड़ रहगुजर में नहीं ..




गुजर गए कि कोई मोड़ रहगुजर में नहीं
मज़ा इसीलिए शायद कोई सफ़र में नहीं

रात भर जेह्न में आतिशफशां दहकता रहा
बूँद भर दाग़ रोशनी का पर सहर में नहीं

बचपना खो गया है नस्ले-नौ का, देखता हूँ
कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा, मिला शहर में नहीं

दुआएं मांगने में जो सुकून था, उतना
जाने क्यूँ चैन उन दुआओं के असर में नहीं

Thursday, 25 August 2011

शबनमी सी रात के आसार हैं, मत रो अभी


कुछ देर रुक जा

चंद लम्हों में बिखर जाएगी महफ़िल
लोग अपनी राह लेंगें
सिर्फ़ थोड़ी देर की है बात बाक़ी, 
मान कहना

रात भर जब ओस की बूंदें उतर कर
सुबह के सूरज की लाली को समेटे
फैल जायेंगीं जमीं पे, जिस तरह 
अनगिनत भीगी हुई आँखों का मंज़र 

क्यूँ भला ये आँख नम है,
क्यूँ नज़र से झांकते हैं लाल डोरे?
फिर नहीं पूछेगा कोई, देखना 
रात भर रोये हो क्या !

अलविदा अश्कों को कहने की घड़ी आने को है
उस घड़ी ना तुम अकेले 
और ना कोई साथ होगा 
जी भर सिसकना ...........

शबनमी सी रात के आसार हैं, मत रो अभी



Thursday, 28 July 2011

आज भी ये रास्ता है



                   आज भी ये रास्ता है, और मैं हूँ

कल भी गुजरे थे मेरे मांदा कदम इस राह से
कल भी मैंने  ठोकरें दो-चार इस के नाम की
आज भी  बिखरे  हुए पत्तों  ने  पहचाना मुझे
चरचराती  ख़ामोशी मैंने सुनी फिर शाम की

आज भी डूबे हो जाने किन ख़यालों में, कहो
मुझसे ये पूछा किसी पत्ते ने फिर गिरते हुए
रास्ते  भर, रास्ते  से  आज  फिर  बातें हुई
रास्ता कहता रहा  और मैं फ़कत सुनते हुए

                  आज भी ये रास्ता है, और मैं हूँ
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मांदा - थके  
(28.07.11)

Friday, 22 July 2011

कैसा दोस्त है! पल भर में बदल जाता है


मैं जब भी हाथ बढ़ाता हूँ, पलट जाता है
कैसा दोस्त है! पल भर में बदल जाता है

मैं हर पिछले गिले को दफ़्न करना चाहता हूँ
उसकी आँखों में नया तंज उभर आता है

ये दुनिया गहरी वादी और मैं बहती सी नदी
हंसीं मंजर दिखाई दे के बिछड़ जाता है

किसके आने का इंतज़ार भला है तुझको ?
भरी दोपहरी में क्यूँ राह झांक आता है

वो जब आता है, ख़ाली हाथ चला आता है
ज़माने भर की पर तकलीफ़ दिए जाता है

सब को मत दोस्त समझ, ख़ुद को ये फ़रेब न दे
पहले आवाज दे के देख, कौन आता है ?

वो जो हंसता है खुले दिल से हर महफ़िल में
जाने क्यूँ अपने घर इतना उदास आता है ?
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तंज - ताना

(21.07.2011)

Tuesday, 19 July 2011

दरिया साहिल तलक नहीं आया


तेरे जाने के बाद चैन मिला
फिर यहाँ कोई भी नहीं आया

तूने जो देख कर नहीं देखा
फिर कोई देखने नहीं आया

उदास, उजड़े मकां-ए-दिल में
फिर कोई भी मकीं नहीं आया

कोई बीता हुआ पैगामे-वफ़ा
खो गया, मुझ तलक नहीं आया

काफ़िले मिहन के चले आये  
क्या हुआ, तू यहाँ नहीं आया

आया तो दूर से ही लौट गया
दरिया साहिल तलक नहीं आया

(19.07.2011)

Sunday, 17 July 2011

ये आवारा सी नज़्में

बिना वजह
बे-वक़्त
गैर-इरादतन
बूँद-बूँद अंधेरों में
बिना बुलाये
कुछ नज़्में इस तरह उतर आती हैं ....

कुछ बीते लम्हे
कुछ पुरानी आवाजें
कोई पिछला दर्द
गुज़री हुई तक़लीफ़
वो नश्तर 
सब नजर आते हैं उनमें 

भटक रही हैं भीतर बहुत दिनों से मगर 
अब इनकी किसी को ज़रूरत नहीं है शायद 
ये आवारा सी नज़्में ......
इन्हें कहाँ रक्खूं?
क्या करूं इनका ?

Saturday, 16 July 2011

कोई ग़म अब नया आये तो अच्छा भी लगे

कोई ग़म अब नया आये तो अच्छा भी लगे
ग़म-ए-दिल तुझसे नाता अब पुराना हो गया

पड़ेगा छोड़ना अब तो तुझे दामन मेरा
मेरे दिल में तुझे आये जमाना हो गया

गुजश्ता-वक़्त में तुझसे लगाया होगा दिल
मगर अब आम सा नजरें चुराना हो गया

मसलसल तिश्ना-लबी है के जबसे तू आया
बेकली को बड़ा मुश्किल छुपाना हो गया

तेरी मौजूदगी के  सब्त ना हो जाएँ निशां
कोई ग़म और का ये दिल ठिकाना हो गया

हरेक मौजे-नफस अब तो डुबाना चाहती है
बड़ा दुश्वार साहिल को बचाना हो गया
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गुजश्ता - बीते हुए 
मसलसल - लगातार 
तिश्ना-लबी - प्यास 
बेकली - बेचैनी 
मौजे-नफस - सांस की लहर 

(04-07-89)

Friday, 15 July 2011

Mumbai Blast 13.07.2011

टूटी खिड़कियाँ कुछ दिनों में बदल दी जाएँगी..
लहू के दाग हमेशा न रहेंगे...
सड़क धो-पुंछ कर साफ़ हो जायेगी,
वैसे भी ये बारिशों के दिन हैं...

अभी कुछ दिन तक हवा में बारूद और मांस की बू रहेगी...
फिर समंदर की खुशनुमा बयार आएगी...

आपस में घालमेल हो चुके बदन के टुकड़ों का
सामूहिक चिताओं में हो चुका सेकुलर दाह-संस्कार
कुछ दिन नजर के सामने रहेगा...

कुछ दिन अस्पताल में घायलों के घावों से ..
टपकती मवाद की बूंदों में टीवी की खबरें लपलपायेंगी ...

आंसूं ब्रेकिंग न्यूज़ हैं...
कल किसी और के दिखाए जायंगे....

टीवी एंकरों की नकली सोज़ भरी आवाजें...
कल कोई नया मुद्दा उठाएंगी...

हमारे कर्णधारों को परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं.....
लोग नहीं मरेंगे को तो क्या उन्हें कोई देखेगा नहीं?
उनके चेहरे तो किसी न किसी बहाने टीवी पे आ ही जायेंगे...

और इसमें शर्मिंदा होने वाली क्या बात है....?

Tuesday, 12 July 2011

कब आओगे ?



मेरी तकलीफ बसती है मेरी आँखों में 
और दिखती है 
जब बिजलियाँ कौंध जाएँ - बाहर 

मेरी आवाज यूँ तो रुंधी सी रहती है
मगर देती है जुबान तूफां को
कभी कभी

दिखती है चुभन
भरोसे की दरकती दीवारों में

आंसू हैं, ढलक उठते हैं

इस नज़्म के तहखाने में उम्मीदों का एक आसमान
दफ़न है  कबसे

जमीन उधडी पडी है
जज्बातों की तरह

अभी भी इंतज़ार है तुम्हें किस पल का?


कुछ हो भी नहीं कि अब मेरे ..?

(12.07.2011)

Tuesday, 5 July 2011

हाँ, यही भूल मैं कर बैठा

किसी नयन से बहते आंसू पौंछ दिए हैं जब से मैंने
सच कहता हूँ उसी घड़ी से मैं जग में बदनाम हो गया

यह नहीं जगत की रीत किसी निर्बल का हाथ बँटाओ तुम
ऐसा न कभी भी हो सकता दुखियों की पीर घटाओ तुम
कर भृकुटि वक्र, तुमको जन-जन देगा ताने, यह याद रखो
क्या तुम को अधिकार किसी अबला के कष्ट मिटाओ तुम
हाँ, यही भूल मैं कर बैठा 
नयनों में आँसूं भर बैठा
सुख की बहती सरि छोड़ कहीं 
मैं दूर किनारे पर बैठा 
कहता हूँ हाय ह्रदय तेरी करुणा का क्या परिणाम हो गया

मैंने अंतस में भरी हुई करुणा के दीप जलाये थे
पथ सुगम किसी का हो जाये इसलिए फूल बिखराए थे
दुःख में डूबी मानवता को मिल जाये सहारा जीने का
यह सोच ह्रदय-तल पर मैंने नन्हे बिरवे उपजाए थे
था नहीं मुझे ये ज्ञात मगर
आशाओं का सिन्धु-प्रखर
भी भर न सकेगा यह मेरी 
रीती रह जाएगी गागर
जीवन-पट की स्वर्णिम आभा का वर्ण गहर कर श्याम हो गया

पर रोक सके पग-गति मेरी दुनिया के बस की बात नहीं
मैं अरे अमर-पथ का राही, क्या रुकूं हजारों घात सही
मैं तृषित-धरा पे नयन-नीर से सुख-वृष्टि करने वाला
मेरी दृष्टि में एक समान, जैसा दिन है, है रात वही
आओ तुम भी दो-चार कदम
है  नहीं  राह  कोई  दुर्गम
कर लो दृढ़-संकल्पित मन को
हो जाये सफलता का उदगम
अब तो दिन रात प्रहर आठों पथ पर बढना ही काम हो गया


(03.08.1989)

Friday, 1 July 2011

शमीम अपने भी नाम की आयी.....

खड़ा हुआ है वो उस किनारे नदिया के
और इस किनारे मुझसे बात करता है
अपनी - अपनी हैं सालिम  कश्तियाँ लिए हर एक 
सुकूं  का आलम है 

जाने क्यूँ इक सवाल पूछ रहा है मुझसे
कि तुमने भी कभी जुर्रत हसीन की थी कभी -
और दरिया में पाँव डाले थे?

शायद भूल गया है कि मैं भी था एक दिन
उसी किनारे पे ठहरा हुआ, बहुत दिन तक  


आज मैं ख़ुद को इस किनारे अगर पाता हूँ
डूबा एक बार तो मैं भी जरूर होउंगा !
पाँव का भीगना क्या होता है?

लहर वो तेज थी, हल्की थी या नहीं थी कोई 
बीच दरिया की लहरों का नाम क्या लेना?
मायने सिर्फ किनारों में ढूंढें जाते हैं 

कोई पिछली नमी बाकी कहाँ तलक रहती  
पैरहन सूख चुका है कब का, 
नयी हवाओं के झोंके कभी रुके हैं भला ?


शमीम अपने भी नाम की आयी
और ठहरी है मेरे पास आके

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सालिम - सुरक्षित 
पैराहन - वस्त्र 
शमीम - बयार 

Thursday, 30 June 2011

कली


सुना तुमने?

कि सांस लेने को जूझती-हांफती कली
हार कर चुक गयी
लेकिन मैं नहीं मानता - नहीं मानूँगा
क्योंकि मैंने कली को हर वक़्त, हर जगह देखा है

जेठ की दुपहरी में
चूल्हे के पास
लकड़ियों से उठते
कडवे धुएं से अंधी हो उठती आँखों में
राख की प्रतिमा सा उभरते देखा है
कली - कहीं भी हो सकती है

तृण-संकल्नार्थ,
प्रातःरश्मि की वंशी पर झूमती
एक के पीछे एक - बनाती निरीह कतार
उन नव-यौवना पर्वत बालाओं को
अनछुआ-पारद-सौंदर्य बिखेरते देखा है
कली - यहाँ भी तो हो सकती है

पार्श्व से उठती ढोलक की थाप पर
उन कदमों की गति-यति में -
उन बाद के पहरों में,
कली - यहाँ भी तो हो सकती है

मूक प्रणय निवेदन करते
सलज्ज - सजल नयनों के उठने - गिरने में
जबकि होंठ चुप हैं -
कि उन पर आ ठहरी है लज्जा -
प्रियतम-सामीप्य से,
प्रेमानल-तप्त धड़कनों में सुना हैं मैंने
कली - कहीं भी हो सकती है

कर्णभेदी शब्द करती दामिनी हो - बाहर
टपकते छप्पर में जमीन पर बिछी - अवश
चिन्हुँकती-सुबकती
कली - यहाँ भी हो सकती है

बेटी के विवाह की चिंता में
पिता के माथे पर आ उतरी विषाद- ज्यामिति में
भाई की राह तकती किन्हीं राखी थामे कलाइयों में

तुम देखो तो सही - आस-पास मेरे तुम्हारे
कोई भी हो सकती है, कहीं भी हो सकती है
बहुत आसान है ढूँढना उसको

क्योंकि
कली एक -
                 घुटन है
                 रुदन है
                 पीड़ा है
                 विवशता है
                 चीख है
                 आंसूं है
                 हिचकी है
                 .............................. और कभी-कभी इस सबसे बग़ावत है.


(The poem was written around 1991-92 after reading Krishnkali - a novel by Shivani)

Sunday, 19 June 2011

एक नज़्म और लिख के जा.....

जाना अगर ज़रूरी है 
तो एक नज़्म और लिख के जा
मेरी ख़ातिर 

उसे पढूं 
और पढ़ के रखूँ 
दिल के इतने करीब  
कि उठती-बैठती छाती की गर्म साँसों में
जी उठे उस पे लिखा 
हर्फ़ एक-एक कर के
मेरे एहसास का घूंघट उतार के रख दे
और छू जाए मेरे वजूद को ऐसे 
मुझे लगे कि अपनी है ये सुहाग की रात
और फिर उम्र भर उस नज़्म से निकाह पढूं ....... 

एक नज़्म और लिख के जा 
जिस पे हक़ हो मेरा


Saturday, 11 June 2011

तुम्हें जो जानती थीं पर वो उंगलियाँ न रहीं

मेरे चमन को फूंकती वो बिजलियाँ न रहीं
मेरे दयार-ए-रोशन की दास्ताँ न रहीं 

दिखा करती थीं अक्सर अब मगर यहाँ न रहीं
बड़ी हसीन सतरंगीं वो तितलियाँ न रहीं

दर्द पिघलने तलक ये चिराग़ जलते रहे
और उसके बाद ये आँखें धुंआ-धुंआ न रहीं

बस कि इक बार चश्मे-नम ने पलट के  देखा
जो भी उससे शिकायतें थीं, दरमियाँ न रहीं

आज कुछ दोस्तों के साथ बोल-हंस आया 
बहुत दिनों से थी दिल में, उदासियाँ न रहीं

फिर से एक बार तुम्हें आज छूना चाहता हूँ 
तुम्हें जो जानती थीं पर वो उंगलियाँ न रहीं

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चश्मे-नम - भीगी आँख
(11.06.2011)

Thursday, 9 June 2011

रुद्रपुर 14 साल बाद 2010 में




वो प्लाट कहाँ है जिसमें हमने
ईंट पे गिट्टी रख के
पिट्ठू गरम किया था...
मेरे दोस्त, अभी भी याद है मुझको
बहुत तेज लगती थी
वो सतरबड़ी लाल गेंद

वो मकानों के बीच से हो कर
गुजरते टेढ़े-मेढ़े रास्ते,
सीधे जाते थे स्कूल तक
अब शहर में सीधी-सीधी गलियां हैं
और सब कुछ हो गया है दूर-दूर

अब कोई 'लाले की औलाद'
जून में साढ़े तीन बजे
घर के बाहर चुपके से
आवाज नहीं लगाती
"मैं बल्ला ले आया, गेंद ले आ"

अब किसी माँ को फ़िक्र नहीं
कहीं मेरा लाल धूप में
निकल तो नहीं भागेगा
खेलने बाहर, क्यूंकि
अब जगह ही नहीं है

कभी लड़के जिन गलियों में
गिल्ली-डंडा खेलते थे
और लडकियां वो स्टापू
या कभी मिलके छुपन-छुपाई
वहां बाज़ार फ़ैल गया है
बचपन छुप गया है

गाँधी पार्क में एक साथ
दस टीमें खेलती थी क्रिकेट
अपनी-अपनी पिच पे
अब एक उदास फव्वारा
कुछ बीयर की बोतलें
और बेतरतीब उगी हुई घास
ना बैटिंग, न बौलिंग, न फील्डिंग

अब झा इंटर कॉलेज
शहर से बाहर नहीं लगता
जनता इंटर कॉलेज
शहर के अन्दर खो गया है
भगत सिंह चौक
भीड़ से घबरा के
कहीं दुबक गया है

अब कोई किसी से रुक कर
बात नहीं करता
सब भाग रहे हैं

अब कोई अपने घर की
दीवार पे बच्चों को
चॉक के विकेट नहीं बनाने देता

अब कारें हैं उन गलियों में
जिनमें साईकिल चलती थी

पहले पुलिस होती थी
सिर्फ पुलिस चौकी में
अब हर जगह मौजूद है

मैं पूरे बाज़ार से गुजर आया
किसी ने नहीं पहचाना मुझे
किसी ने नहीं टोका
गलत ही सही, नाम से नहीं पुकारा -
और मैंने यहाँ इक्कीस साल गुजारे थे!

ये शहर बड़ा हो गया है
लोग छोटे हो गए हैं.....



(09.06.2011)

Monday, 6 June 2011

किसके हिस्से की नमी, पलकों पे अपनी तुम लिए


किसके हिस्से की नमी 
पलकों पे अपनी तुम लिए 
अजनबी इक राह पे 
जाते हो ऐसे रूठ कर 
जैसे नहीं आओगे अब 

क्या हो गया, कुछ तो कहो? 
जो चुभ गया भीतर तलक 
तकना भी तुमको अब इधर
गोया गवारा है नहीं !
मुखतलिफ़ से तौर हैं

क्या रंज है, तकलीफ़ है 
कुछ न कुछ बदला तो है 
गुमसुम हो, मुझ से दूर हो
बात तक करते नहीं
कुछ तो कहूं, गर तुम सुनो

गर है तो अपनी बस यही 
उम्मीद तुमसे मुख़्तसर 
जब कभी तुमको लगे
दिल परेशां बे-सबब 
याद करना, एक पल

क्या पता ऐसा भी हो
कि जिस दिए की आंच में
जल रहे हो तुम, वही
मुझ तक पहुँच जाती है और
कुछ है झुलस जाता है जो.....
(06.06.11)

Saturday, 4 June 2011

जब से दुःख में तू मेरे



ना मैं रूठा, ना कोई मुझको मनाने आया
कोई भूला भी नहीं और ना बुलाने आया

वो हर राज जो कभी तुझपे हमने खोला था 
अच्छा! वो  राज हमें ही तू सुनाने आया

क्या सुनें बात तेरी और क्या तेरे साथ चलें
किसी का होना ना तुझको ओ ज़माने आया

छोड़ जाने का तेरे हमने गिला छोड़ दिया
जब से दुःख में तू मेरी आस बंधाने आया

(04.06.2011)

Wednesday, 1 June 2011

सब की सब मेरे नाम होने दे



 ग़म की है शाम, शाम होने दे 

 इसका किस्सा तमाम होने दे 

 कल सुबह इक नयी सुबह होगी 
 शब का जो हो अंजाम होने दे 

 जाने कल रास्ते बदल जाएँ   
 कुछ क़दम ख़ुशख़िराम होने दे

 अब नहीं पर्दा किसी भी शै से 
 होने दे, बात आम होने दे

 जिन बदनामियों का कोई नहीं 
 सब की सब मेरे नाम होने दे

 मुझको लिखने से चैन है बाकी 
 होने दे, गुम पयाम होने दे

(01.06.2011)

तेरा आगाजे-मुहब्बत है, अभी मुमकिन है


जा मेरे दोस्त मेरे ग़म से  कनारा कर ले
होगा बेहतर के कहीं दूर गुज़ारा कर ले


मैं तेरे साथ रहूँगा तो सुबहो-शाम यही
रंज और दुःख की कहानी के सिवा क्या होगा
कितने लम्हों ने मेरे साथ ख़ुशी देखी थी
उन्हें तो तू भी मेरे दोस्त जानता होगा


सिवाय उनके मेरे पास हसीं कुछ भी नहीं
तंज़ो-तकलीफ़, कशमकश की कमी कुछ भी नहीं
एक फेहरिश्त है झुलसे हुए अरमानों की
सिवाय अफसुर्दा उम्मीदों के कहीं कुछ भी नहीं


मैं अपनी जीस्त के काले घने अंधेरों में
शुमार तुझको करूँ, मुझसे हो ना पायेगा
क़दम-क़दम पे दरिया है मुश्किलातों का
ये जुल्म तुझपे मेरे दोस्त हो ना पायेगा


कैसे कह दूं के मेरे साथ चल, तेरी कमसिन
जवान उम्र, ये तकलीफ़ भला क्यूँ ढोये
ये आरिज़ों के कँवल, सुर्ख तबस्सुम तेरी
मेरे हालात की मुश्किल में भला क्यूँ खोये


तेरा आगाजे-मुहब्बत है, अभी मुमकिन है
थोडा मुश्किल तो है, एक बार गवारा कर ले
जा मेरे दोस्त मेरे ग़म से कनारा कर ले
होगा बेहतर के कहीं दूर गुज़ारा कर ले

Tuesday, 31 May 2011

उसका ख़त पढ़ के मुझे इतना ऐतबार आया


वो मुझे भूल चुका, भूल चुका, भूल चुका
उसका ख़त पढ़ के मुझे इतना ऐतबार आया

ये और बात है हर हर्फ़ के कलेजे में
मेरा ही नाम नज़र मुझको बार-बार आया

ये कैसे मान लूं वो चाहता नहीं मुझको
क्या हुआ जो ख़त उसका कभी-कभार आया

सुना है उसको संग-सार किया जायेगा
मैं ख़ुद को उसके रकीबों में कर शुमार आया 

(31.05.11)
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संग-सार - पत्थर से मारना

वो तो चुप था कि रुस्वाइयाँ ना हों मेरी


चंद शेर 

वो तो चुप था कि रुस्वाइयाँ  ना हों  मेरी
मैं ये समझा कि नहीं कोई शिकायत बाकी 

करके बैठे हैं कब से वो मुहब्बत चुकता
देखना ये है कि शायद हो अदावत बाकी 
************
बन के फिर दोस्त कोई आया है धोखा देने
मगर उसे भी कलेजे से लगाना होगा

मैं जानता हूँ इस बार भी देगा वो फ़रेब
मगर हसीन है धोखा तो फिर खाना होगा
************
मैं उस से हाथ मिला लूंगा कोई बात नहीं
उस से कह दो ना इसे मेरी लगावट समझे

कोई दम बैठ के जो सांस भरी है मैंने
ना आहे-इश्क़, इसे मेरी थकावट समझे
***********

टूट कर भी वो झूठ नहीं बोलेगा
उसकी फ़ितरत है आईने की तरह

(31.05.11)

Friday, 27 May 2011

दिल में लेकिन ख़ला नहीं रखना


मुझको आदत है दिल दुखाने की
दोस्त   मेरे,  गिला   नहीं  रखना

मैं   भले   ही   करीब   ना   आऊँ 
फिर भी तुम फ़ासला नहीं रखना

वक़्त  है तंग  तुम तूफानों के 
पास  ये काफ़िला नहीं रखना

ख़ुशी-औ-ग़म की गिनतियों में कभी
क्या  मिला,  ना  मिला, नहीं  रखना 

दोस्त  रखना  क़रीब  या दुश्मन
पास कोई  दिलजला नहीं रखना

चाहे ख़ुशियाँ हों या के ग़म रखना
दिल में लेकिन  ख़ला नहीं रखना

Thursday, 26 May 2011

मुझ से गर यूँ नजर मिलाओगे

सुना है तुम सफ़र पे निकले हो  
मुझको दरवाजे ताकने होंगे  


मुझ से गर यूँ नजर मिलाओगे 
रूह के दाग़ ढांपने  होंगे 


ख़्वाब आँखों में मेरी मत रक्खो  
मुझको ता-उम्र पालने होंगे


ख़ुद से पहले ही कुछ शिकायत है  
ये गिले भी सँभालने होंगे


हंस के तुम तो चले ही जाओगे 
मुझको आँसू बुहारने होंगें


रंज की रात कट चुकी कब की  
दुःख के दिन अब गुजारने होंगे


अगरचे हम ख़ुशी न बाँट सके 
ग़म तो आपस में बांटने होंगे


ज़िक्र आएगा ऐसे लमहों का 
जो हमें हंस के टालने होंगे


मैं बुरा हूँ मगर मेरे कुछ तो 
तुमको एहसान मानने होंगे


जिनको बहना था कश्तियों में हैं
हमको साहिल तलाशने होंगे


(26.05.11)







तमन्ना लौट कर जाने की



लौट  आया  हूँ  ख़ुदा  तेरे  जहाँ  से  मैं 
तमन्ना  लौट  कर  जाने  की  मुझको एक  नहीं
लाजमी   है  के  अचरज  तुझे  हुआ  होगा
मगर  हैरान  इस  हद  होके  मुझको देख  नहीं


ये  सच  है कि  देखने  में  है  हसीं  बहुत
जहाँ  जो  तूने अता  है  किया  हमारी  नजर
हर  एक  ज़र्रा  बेशक  है  दिलकशी  में  गज़ब
हर  आलम  में नजर आता  है ख़ुदाई असर

हंसीं  वादियाँ  जिनमें  घटाओं  के  मंजर
जिन्हें  निहार  के  तबीयत  को  नशा  आ  जाये
और बारिश में मिट्टी की ले महक सौंधी
बहे  बयार  तो  ज़न्नत का  मजा  आ  जाये

मगर  ये  क्या  किया,  तूने  बना  दिया  इन्सां
अपने  हाथों  से  क्यूँ  बहार  में खिज़ां भेजी
हरेक  शै  उदास  हो  गयी  है  जब  से
स्याह  शख्शियत  इन्सां  की  यहाँ  भेजी

स्याह करतूतों का आलम ये है के देते हैं
मात  शैतान  को  मेरे  ख़ुदा, तेरे  बन्दे
और तो और, अब इक साथ रह नहीं सकते
तेरी  दुनिया  में  मेरे  ख़ुदा, तेरे  बन्दे

जो  जमीन  तूने हसरतों  से  दी  उनको
उन्होंने  बाँट  कर  रख  दी  वहां, वही  धरती
बांटते-बांटते  इस  हद  हुआ  है  बंटवारा
बंटी  है  रोशनी, जुदा -जुदा  हवा  बहती

ख़ुद भी  बँट गए  मज़हब  के नाम पर  सारे
ये  हिन्दू, ये  मुसलमान, ये ईसाई है
राम -रहीम  में , ईसा में   और  मूसा  में
गज़ब  हुआ ख़ुदा, बँटी  तेरी  ख़ुदाई  है

हकीक़त ये  कि  बच्चे  भी  दो  तरह  के  हैं
एक  तो  वे  जिन्हें  नसीब  हैं  आराम  सभी
सुबह  हंसती  हुई आती  है जिनकी  दुनिया  में
उदास  उनके  लिए  होती  नहीं  है शाम कभी

जिसकी किस्मत  में लिखा  ही  नहीं जवां  होना
एक  बचपन  वहां  है  और,  गंदी गलियों में
आज, बस आज, अगर पेट  उसका  भर  जाये
उसको मिल जाएगी ज़न्नत, गलीज गलियों में

वो बचपन जवान होगा जब बुढ़ापे की
झुर्रियों में सन जायेगा उसका चेहरा
भटकता हुआ वीरानियों में, ढोए हुए
बारे-जीस्त, जब थक जायेगा उसका चेहरा

आज इन्सान में इंसानियत नहीं बाकी
शख्श हर एक, एक-दूसरे का दुश्मन है
हर तरफ खून के दरिये, क़त्ल की साजिश
दिलों में आ गयी न जाने कैसी भटकन है

रगें इन्सान की अब खून नहीं ले जाती
उनमें भर गया है वहशतों का लावा
चैन दो पल नहीं, क़रार नहीं मुद्दत से
दिमागों पर हुआ है दहशतों का दावा

आज इन्सां नहीं पीता तेरा दिया पानी
है पसंद उसको पीना खून इन्सां का
लाश देख, वो रोता नहीं है, हँसता है
इस हद पे आ गया जूनून इन्सां का

ऐसी बस्ती को बसाने से तो बेहतर होता
जहां में हर तरफ सुनसान वीराने होते
क़त्ल हो गए इन्सान ही के हाथों जो
बदन ना उनके हमें रोज़ जलाने होते

तमन्ना लौट कर जाने की मुझको एक नहीं…...


Wednesday, 25 May 2011

पूछिए ना आप क्या हुआ



 उजड़े आशियाँ पे रोयेंगे
 खूने-तमन्ना पे रोयेंगे 


 जख्म ऐसे दिल को मिल गए
 आज मुंह छुपा के रोयेंगे


 आंसुओं की बात आ गयी
 आज मुस्कुरा के रोयेंगे


 छोडिये जफा की बात को
 उनकी हम वफ़ा पे रोयेंगे


 दिल ने आज फैसला किया 
 उनको भी रुला के रोयेंगे


 इस जमीं का जिक्र क्या करें
 हम तो आसमां पे रोयेंगे


 पूछिए ना आप क्या हुआ
 आप दास्तां पे रोयेंगे  

Monday, 23 May 2011

विदा करती हथेली धीरे धीरे थक गयी होगी



सांवली धूप काले बादलों से खेलती होगी
कहानी बन रही होगी
किसी की आँख छिप कर गेसुओं में देखती होगी
कहानी बन रही होगी
झील में कोई कश्ती दिल की मानिंद डोलती होगी
कहानी बन रही होगी
भीगी आँख में शबनम पलक पे झूलती होगी
कहानी बन रही होगी
किसी की आस ढलकर उन खतों में बोलती होगी
कहानी बन रही होगी 
कोई उम्मीद मिलने दूर तक अक्सर गयी होगी
कहानी बन रही होगी
विदा करती हथेली धीरे धीरे थक गयी होगी
कहानी ..........



(23.05.11)

Sunday, 22 May 2011

होली


दोनों हाथों से चेहरा ढके हुए अपना
लाज से लाल कपोलों को थी छुपाये हुए
रही थी भीग वो फागुन की रंग-वर्षा में
भीगे आँचल में थी कमनीयता समाये हुए

थोड़ी शरमाई हुई, थोड़ी सी घबराई हुई
घटा गुलाल की उमड़ी तो वो सहमी-सिहरी
ऐसी होली भी इक बार मैंने देखी थी
रगों के गर्म लहू सी थी लालिमा बिखरी

वक़्त को बीतने में वक़्त कहाँ लगता है
हर सुबह आफ़ताब लाल मचल जाता है
दुनिया दिन भर में थोड़ी सी बदल जाती है
शाम ढलती है तो सूरज भी पिघल जाता है

लेकिन इस बार फिजां ज्यादा ही तब्दील हुई
और माहौल भी इस बार कुछ अजीब सा है
जिसको देखो उदासियों की तरह गुमसुम है
रूह मुर्दे की तरह, तन किसी सलीब सा है

जिस गली से गुजरता हूँ, ठहर जाता हूँ
खून के दाग देखता हूँ, ठहर जाता हूँ
जिधर भी देखिये वहशतों का आलम है
ये सब देख सिहरता हूँ, ठहर जाता हूँ

और इसी वहशतों के आलम में
चाँद शैतानों की हैवानियत मचल उट्ठी
उस कमसिन उमर को इस क़दर निचोड़ा है
देख इंसानियत की आत्मा दहल उट्ठी

अब भी खोये हैं राग-रंग में वहशी सारे
साल भर होली उनकी, उम्र भर दीवाली है
नसों में रक्त अब भी खौलता है लेकिन
नहीं इस गर्मी की तासीर पहले वाली है

फिर से लौट कर आया तो है फागुन लेकिन
कैसे बतलाओ इस माहौल में होली खेलें
उस मासूम की हालत पे नजर जाती है
तो दिल करता है होली में दीवाली खेलें

घर के आँगन में नीम तले पागल सी
देखो बैठी है सर अपना वो झुकाए हुए
दोनों हाथों से चेहरा ढके हुए अपना
लाज से लाल कपोलों को है छुपाये हुए

Saturday, 21 May 2011

न जाने क्यूँ

 तन्हाई ही में काटी मैंने राहे-ज़िंदगी 
 और जनाज़े  में हजारों साथ हो गए

 जिनके हरेक ग़म में मेरी आँख हुई नम
 मेरे ग़म उनके लिए मजाक  हो गए

 उम्र भर जो काम किये नेकी के लिए
 बन के वही दामन पे मेरे दाग़ हो गए

 हर सुबह सोचा कि आज है ख़ुशी का दिन
 शाम तक न जाने क्यूँ उदास हो गए

 इक बार कर लिए इरादे जब बुलंद
 ख़ुद-ब-ख़ुद साहिल हमारे पास हो गए

(11.05.89)

Thursday, 19 May 2011

अभी कुछ रोज़ कश्ती


यहाँ हरियाली बहुत है तो जंगल काट डालो फिर
मिटा के कोह सारा बियाबानों का मज़ा लो फिर 

अभी बहती हुई नदियाँ नहीं अच्छी तुम्हें लगतीं ?
बाँध कर बाँध पानी ही न क्यों इनका सुखा लो फिर

सुना है, आ चुके हो तंग तुम सैलानियों से अब  !
न कुछ दिन में कोई आएगा जितना भी बुला लो फिर

न  होगी  झील  ना  कोई  कतारें  देवदारों  की
अभी कुछ रोज़ कश्ती तुम जो चाहो तो चला लो फिर

कोह - पहाड़ 

(19.05.11)

दीवारें

हम आंसूं भी नहीं हैं..

अगर होते  तो हमें सहेजने कोई तो दामन नज़र आता !

हम ओस भी नहीं बन पाए
कि बिखर जाते स्नेह की दूब पर 
और निशा शांत गुजर जाती...

हम तो अभिमन्यु की तरह,
जन्म से पहले ही मृत्यु के लिए अभिशप्त 
अनकही कथाओं के पात्र ,
अस्तित्व-विहीनता में जीवन की तलाश में हैं

लेकिन मार्ग कहाँ है इस चक्र-व्यूह में?

जहाँ उन शब्दों की दीवारें हैं, जो कभी बोले नहीं गए...

(15.09.92)

मैं एक मुसाफिर हूँ

 हर  शख्श  बेगाना  है,  हर दिल  वीराना है
 तुम   मानो   ना  मानो,  बेदर्द   जमाना  है

 हर सुबह निकलना है होठों पे हंसी  लेकर
 हर शाम ढले घर पर ग़म ले कर आना है

 इस  दुनिया  से  अक्सर  कांटे  ही पाये हैं
 उम्मीद  में  फूलों  की  दामन  फैलाना है

 है  दर्द  नया  जिसमें  पर  बोल  पुराने  हैं
 वो गीत मुझे तुमको इक बार सुनाना है 

 मैं एक मुसाफिर हूँ तुम रोको मत मुझको
 इस दर से गुजर के फिर नहीं लौट के आना है

(03.06.90)