Sunday, 31 January 2016

न हम समझे, न तुम समझे



कहीं लिख दी थी हमने दिल की अपने दास्ताँ लेकिन
ये किस-किस से छुपानी थी, न हम समझे, न तुम समझे


चलो छोडो किसे अब याद है किस्सा गए कल का
ये क्या किस्सा-कहानी थी, न हम समझे, न तुम समझे


जिन्हें महफूज़ दिल में हम समझते थे, वही यादें,
इसे भी भूल जानी थी, न हम समझे न तुम समझे


जिसे बस वक़्त का बीता हुआ लम्हा समझ बैठे
ग़मे-दिल की रवानी थी, न हम समझे, न तुम समझे

5 comments:

  1. जिन्हें महफूज़ दिल में हम समझते थे, वही यादें,
    इसे भी भूल जानी थी, न हम समझे न तुम समझे
    ..... बेहद प्रभावी

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  2. ''न हम समझे.. न तुम समझे'' बहुत ही सुंदर और प्रभावी रचना के रूप में हमारे सामने आयी है। आपका आभार। पुष्पेंद्र जी, आपका ब्लाग तो बहुत ही अच्छा है और पुराना भी। यदि आप ब्लागिंग के बारे में गहराई से सीखने और समझने का प्रयत्न करें, तो इस ब्लाग पर आपको गूगल एडसेंस की सर्विस मिल सकती है। पर वर्तमान परिस्थितियों में यह संभव नहीं है। आपको अपना ब्लाग गूगल की शर्तों के अनुरूप बदलना होेगा।

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  3. ''न हम समझे.. न तुम समझे'' बहुत ही सुंदर और प्रभावी रचना के रूप में हमारे सामने आयी है। आपका आभार। पुष्पेंद्र जी, आपका ब्लाग तो बहुत ही अच्छा है और पुराना भी। यदि आप ब्लागिंग के बारे में गहराई से सीखने और समझने का प्रयत्न करें, तो इस ब्लाग पर आपको गूगल एडसेंस की सर्विस मिल सकती है। पर वर्तमान परिस्थितियों में यह संभव नहीं है। आपको अपना ब्लाग गूगल की शर्तों के अनुरूप बदलना होेगा।

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    अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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