Tuesday, 4 November 2014

जो पराया था उसे अपना बना के देखता



जो पराया था उसे अपना बना के देखता
वक़्त मिलता और तो क्या-क्या बना के देखता


यूँ तो आँखों ने नज़ारे कम नहीं देखे मगर
इक दफ़ा उसकी निगाहों में समा के देखता


ये भी मुमकिन था के वो एक बार फिर दिल तोड़ता
फिर भी चाहत थी उसे दिल में बसा के देखता


जिसने कल दो-चार क़दमों तक निभाया था सफ़र
आज उसके साथ इक रस्ता बना के देखता


चार बूँदें भी अगर दामन में जो होती मेरे
बैठ कर साहिल पे मैं दरया बना के देखता

Friday, 26 September 2014

तुमने चाहा ही नहीं वरना ये मुश्किल तो नहीं


चल तो सकते थे कुछ दूर, बिछड़ जाने तक
हंस भी सकते थे आँखों के उमड़ आने तक
तुमने चाहा ही नहीं वरना ये मुश्किल तो नहीं
बसना एक घर का, बस्ती के उजड़ जाने तक

माना ये तय था के हम साथ न चल पाएँगे
माना ये तय था के रस्ते ये बदल जाएँगे
माना ये तय था के एहसास बदल जाएँगे
माना ये तय था के अल्फ़ाज़ फिसल जाएँगे

फिर भी कुछ करके सफ़र हाथ छुड़ा जाते तो
फिर भी कुछ कहके अगर बात बढ़ा लेते तो
फिर भी कुछ रहके अगर साथ जुदा होते तो
फिर भी कुछ भरके नज़र आप खफा होते तो

मेरे कदमों का सफ़र आज भी ना चलता रहता
बीती बातों का असर इतना ना फलता रहता
हाथ में हाथ नहीं, उसकी खलिश तो रहती
अपनी उल्फ़त का शजर ऐसा ना जलता रहता  

Wednesday, 23 July 2014

झील पे डोलती इक नाव भला क्या चाहे?



झील पे डोलती इक नाव भला क्या चाहे?

आज तुम साथ चले संग मेरे लहरों पे
हाथ में हाथ लिए साथ साथ बैठे हो
अभी शुरू है किया एक सफर दोनों ने
के जिस पे दूर तलक, दूर तलक जाना है
अभी उमंग भरे ख्वाब आँख में होंगे
फकत सुनहरी जिंदगी ये नजर आएगी
बहुत हसीन लगेगा ये नया अफ़साना
लबों पे वस्ल की धुन खुद ही उतर आएगी
दुआ है मेरी मुहब्बत उमर-दराज बने

झील पे डोलती इक नाव भला क्या चाहे?

मगर सुनो कि मेरे पास और भी कुछ है
जो आज मैं कहना भी चाहूँ तो कह नहीं सकती
मगर जो सलवटें मेरी सतह पे दिखती हैं
उनमें जाते हुए ये बात मेरी पढ़ जाना
कि जिस सफर पे कदम चंद अभी रक्खे हैं
ये आगे चल के हमेशा हसीनो-नाजुक हो
ये हो तो सकता है, अक्सर मगर नहीं होता !

मुश्किलें लाख तरीकों से सर उठाएंगी
उनकी आँखों में आँख दे जवाब दे देना
उस घडी हाथ में फिर हाथ अपने ले लेना,
जेहन में बारहा शक की लकीरें उभरेंगी
प्यार का लम्स मगर उनको मिटा देता है,
ज़ल्द ही वक़्त चला जाएगा बेफिक्री का
और बच्चों, बड़ों की, रोज़गार-दुनिया की
हर किसम की  दुश्वारियां आ बैठेंगी,
उनको आना है, मगर उनकी खैरकदमी में
एक दूजे को कहीं भूल नहीं जाना तुम

बहुत दिन बाद अगर हो सके तो फिर एक बार
अपने बच्चों को लिए लौट के जब आओगे 
(अभी आहिस्ता से लेकर चली हूँ मैं तुमको
बहुत धीरे से डोलती हूँ झील में इस पल)
देखना किस तरह पानी को छपछपाते हुए
मैं उस रोज़ कैसे झील में इतराउंगी
एक दफा, एक दफा बस और यहां आना तुम
देखना किस तरह मस्ती में झूम जाउंगी

झील पे डोलती इक नाव भला क्या चाहे?

Wednesday, 16 July 2014

टूटे रिश्ते

टूटे रिश्ते, आँख मिला कर हंस लेंगे पर,
हाथ पकड़, फिर साथ चलें, कब हो पाता है


पगले मनुआ, राह पुरानी, बात पुरानी,
खुद को नाहक बहलाता है, फुसलाता है


यादों की बारिश में भीगे, दिल तो चाहे,
वक़्त का सर पे दूर तलक फैला छाता है


मन बैरी है, बात ना माने, ज़िद पकड़े है,
बंद पड़ी गलियों में क्यूँ आता जाता है