Friday, 26 September 2014

तुमने चाहा ही नहीं वरना ये मुश्किल तो नहीं


चल तो सकते थे कुछ दूर, बिछड़ जाने तक
हंस भी सकते थे आँखों के उमड़ आने तक
तुमने चाहा ही नहीं वरना ये मुश्किल तो नहीं
बसना एक घर का, बस्ती के उजड़ जाने तक

माना ये तय था के हम साथ न चल पाएँगे
माना ये तय था के रस्ते ये बदल जाएँगे
माना ये तय था के एहसास बदल जाएँगे
माना ये तय था के अल्फ़ाज़ फिसल जाएँगे

फिर भी कुछ करके सफ़र हाथ छुड़ा जाते तो
फिर भी कुछ कहके अगर बात बढ़ा लेते तो
फिर भी कुछ रहके अगर साथ जुदा होते तो
फिर भी कुछ भरके नज़र आप खफा होते तो

मेरे कदमों का सफ़र आज भी ना चलता रहता
बीती बातों का असर इतना ना फलता रहता
हाथ में हाथ नहीं, उसकी खलिश तो रहती
अपनी उल्फ़त का शजर ऐसा ना जलता रहता  

5 comments:

  1. bahut sundar.... bahut din baad aapki kalam se !!!!!!

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  2. bahut din baad...par behad sunder....

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  3. बहुत सुंदर... बहुत अच्छा लगा..इस पेज पर आकर...
    ऐसे ही लिखते रहिए...
    आपके लेखन के कुछ अंशों के अपनी पत्रिकाओं आदि में आपके नाम के साथ प्रकाशन की अनुमति चाहता हूं।।

    सादर
    डॉ राजीव रावत
    आईआईटी खड़गपुर

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  4. डा. राजीव रावत जी. आपका सराहने के लिए धन्यवाद.
    ये मेरे लिए खुशी की बात होगी यदि आप मेरे लिखे को कहीं छपने योग्य समझते हैं !

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