Friday, 25 November 2011

जो भी चाहे तू फैसला कर दे



जब भी अलफ़ाज गूंगे होते हैं
और एहसास बहरे होते हैं
वक़्त होता है बस तमाशाई
रूह का पोर -पोर दुखता है
मुसलसल दर्द का मकां दिल है
रंज भी मुख़्तसर नहीं होता

ऐसे आलम में मैं कहाँ जाऊं
ऐसी हालत में क्या मुझे राहत
कोई रिश्ता सदा नहीं देता
कोई एहबाब सूझता ही नहीं
मुझको मंदिर नज़र नहीं आते
कोई मस्जिद नहीं बुलाती मुझे

ऐसी हालत में सर झुकाता हूँ
दुआ में हाथ मैं उठाता हूँ
जो भी चाहे तू फैसला कर दे
बस कि अब तेरे पास आता हूँ.....

Sunday, 20 November 2011

ओ भटकने वाले ठहर जा



ये सफ़र न होगा कभी ख़तम, न इसकी कोई शुरुआत है
ओ भटकने वाले ठहर जा, तेरे नाम ये हंसीं रात है


ये रवां-रवां सी ज़िन्दगी 
ये धुआं-धुआं सी रोशनी
ये कदम-कदम पे फ़ासले
ये दूर होते सिलसिले
मेरे पास आ, इन्हें भूल जा
मेरे गेसुओं में डूब जा
ये अदाएं घायल तेरे लिए
ये निगाहें पागल तेरे लिए
आ मुझे गले से लगा ले तू, ये प्यार की शुरुआत है


ये जाम सा छलका बदन
ये सर से पैरों तक जलन
ये उम्र की अंगड़ाइयां
ये जिस्म की परछाइयां
ये सुलगते दिल की करवटें
ये नज़र पे छाई सलवटें
ये दायरा मेरी बाँहों का
ये सिलसिला मेरी सांसों का
यही मान ले तेरे वास्ते मेरे इश्क़ की सौगात है

Wednesday, 16 November 2011

उस पार, ऐसा हो

कभी खुद को मैं ढूंढूं इस तरफ इक बार, ऐसा हो
निगाहे-रूह तुझ पर हो टिकी उस पार, ऐसा हो

मैं राहे ज़िंदगी में जिनको पीछे छोड़ आया था
वो यादें सब की सब आयें कभी उस पार, ऐसा हो

मैं अक्सर डूब कर ही पार करता हूँ नदी दिल की
कभी कश्ती सहारे भी चलूँ उस पार, ऐसा हो

वो कुछ अशआर रिस कर गिर गए लब से कहीं मेरे
तेरे लब पे दिखाई दें मुझे उस पार, ऐसा हो

बहुत दिन से तुझे मैं दूर से ही चाहता हूँ, अब
लगूं खुल के गले तुझसे सरे-बाज़ार, ऐसा हो

किनारे पर खड़े हो के तमाशा देखने वाला
कभी आके मिले मुझसे यहाँ मंझधार, ऐसा हो

Thursday, 3 November 2011

क्यूँ वो तुम्हें याद रहीं?

अपने आँगन में खिली धूप की स्याही लेकर
उसने कुछ ख़त भी लिखे होंगें, तुम्हें याद नहीं?

कितनी शामों को पिघलते हुए सूरज की तरह
उसकी उम्मीद जली होगी, तुम्हें याद नहीं?

सुबहा उठके जो चटके हुए ख़्वाबों की किरच
उसकी आँखों में चुभी होगी, तुम्हें याद नहीं?

पर यूँही हँस के कही आख़िरी बातें उसकी
क्यूँ ना तुम भूल सके, क्यूँ वो तुम्हें याद रहीं?

Tuesday, 1 November 2011

दरीचे दिल के खुल पायेंगें फिर, ऐसा नहीं लगता

दरीचे दिल के खुल पायेंगें फिर, ऐसा नहीं लगता
उसे हम दोस्त कह पायेंगें फिर, ऐसा नहीं लगता 
नहीं अब याद कुछ, किस  मोड़ से भटके थे हम रस्ता  
लौट के घर को जा पायेंगें फिर, ऐसा नहीं लगता 
बहुत अब दूर आ निकले हैं हम राहे-मुहब्बत में
अजनबी तुम से मिल पायेंगें फिर, ऐसा नहीं लगता 
वो कुछ बीते हुए लम्हे, वो कुछ बीती हुई घड़ियाँ
नज़र में आज  लहरायेंगें फिर, ऐसा नहीं लगता 
कि जिन लहरों से हम कश्ती, बचा लाये थे मुश्किल से
उसी दरिया में तैरायेंगें फिर, ऐसा नहीं लगता 
बहुत ही दूर तक पसरी हुई है दिल में ख़ामोशी
उसे सब को सुना पायेंगें फिर, ऐसा नहीं लगता