Sunday, 19 June 2011

एक नज़्म और लिख के जा.....

जाना अगर ज़रूरी है 
तो एक नज़्म और लिख के जा
मेरी ख़ातिर 

उसे पढूं 
और पढ़ के रखूँ 
दिल के इतने करीब  
कि उठती-बैठती छाती की गर्म साँसों में
जी उठे उस पे लिखा 
हर्फ़ एक-एक कर के
मेरे एहसास का घूंघट उतार के रख दे
और छू जाए मेरे वजूद को ऐसे 
मुझे लगे कि अपनी है ये सुहाग की रात
और फिर उम्र भर उस नज़्म से निकाह पढूं ....... 

एक नज़्म और लिख के जा 
जिस पे हक़ हो मेरा


6 comments:

  1. ek nazm aur likh ke ja..jis par haq ho mera..
    wow!..very expressive..as usual m speechless..!
    :)

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  2. thanks Dev.
    Nandita, you always have kind words to offer... thanks.

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  3. :) U know it.. I don't appreciate each and every nazm's... but u have an art of expressing so beautifully... keep writing.. U rock!! :)

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  4. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

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