Thursday, 8 December 2011

हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बिकती है

सुनते हैं कि  कुछ अरसा पहले, इस मुल्क़ में रहने वालों ने 
इसकी आज़ादी की खातिर, फ़ांसी के फंदे  चूम लिए
था अज़ब शौक़, थी अज़ब लगन, जो जान हथेली पे लेकर
कुछ गोली खाकर झूम लिए, कुछ कालापानी घूम लिए

था यही ख़्वाब बस आँखों में, कि मेरे वतन की नस्ले-नौ
किसी गैर कौम के पैरों तले, जाये ना कभी मसली-कुचली
अरमान यही एक दिल में था, कि मेरे वतन की नस्ले-नौ
बरबाद कभी ना हो पाए, ग़ैरों के गिराने से बिजली

इक उम्र तुम्हारी जैसी ही, इक उम्र हमारे जैसी ही
पाई थी उन्होंने भी लेकिन, कुछ तेरे लिए, कुछ मेरे लिए
इस मुल्क़ की मिट्टी पे अपने खूं की सुर्ख़ी से छाप गए
सतरंगीं  सपने यहाँ-वहां, कुछ तेरे लिए, कुछ मेरे लिए

इक उम्र ने अपना खून कभी, इसलिए बहाया था शायद 
ये ताजे पानी की झीलें, ये दरिया हमको मिल पायें
इक उम्र ने सांसों में अपनी बारूद की बू सूंघी शायद 
हर सुबह सुहानी ताजी हवा, मस्तानी हमको मिल पाए

कुछ लोग थे ऐसे जो अपनी मां के आंसूं भी भूल गए
इसलिए कि अश्कों का नाता, कोई अपनी आँख से हो ना कभी 
कुछ लोग थे ऐसे रिश्ता भी जो बाप से अपना भूल गए
इसलिए कि हम में से कोई भी, जुदा बाप से हो ना कभी

जो खून बहाया पुरखों ने, उस खून की रंगत काम आयी
जो जुल्म सहा था पुरखों ने उस जुल्म की वहशत काम आयी
हर बूँद पसीने की उनके,  दे कर के अपना मोल गयी
वो रातें जगती काम आयीं, वो दिन की दहशत काम आयी

अब मुल्क़ हमारा था अपना
और राज हमारा था अपना
थी जमीं हमारी अपनी और 
ये गगन हमारा था अपना

दो-चार दिनों सब ठीक रहा
दो-चार दिनों तक खेल रहा 
दो-चार दिनों तक रहा अमन
दो-चार दिनों तक मेल रहा

फिर शक की निगाहें उठने लगीं
फिर दिल में दरारें पड़ने लगीं
इस चमन की कलियाँ हुई जुदा
फिर क्यारी-क्यारी बँटने लगीं

सबसे पहले नेताओं की खादी का मोल लगा, फिर तो 
ईमान बिका, इंसान बिका, बिक गई हसरत, अरमान बिका
इस वतन की मिट्टी भी बेची, गर्दू-ए-वतन तक बेच दिया
अब देर नहीं है कुछ दिन में लगता है हिन्दुस्तान बिका

बस  लूट के अपनों को लीडर अपनी ही तिजोरी भरते रहे
कुर्सी से शुरू, कुर्सी पे ख़तम, बस ऐसी सियासत करते रहे
लाखों भूखे-प्यासे इन्सां सड़कों के किनारे मरते रहे
लाखों इन्सान यहाँ नंगे सज के चिथड़ों में फिरते रहे

बंजर मिट्टी में हाथों का दम जाया करते हैं दहकां
खेतों में पसीने के दरिये, उनके थे पहले, आज भी हैं
हर बार उगी हैं फसलें पर, बदलीं न कभी खुशहाली में
इफ़लास-जदा इस मुल्क़ के दह्कां थे पहले और आज भी हैं 

वो गन्दुम जो उसके खेतों में उगा था, उसको मिल ना सका
उसके बेटे भूखे ही रहे, रही बेटियाँ कम मलबूसों में
माज़ी है गरीबी ही उसका, फ़र्दा भी गरीबी ही होगा
इक लहज़ा फ़ना हो जायेगा, सरमाये की गलियों-कूचों में

इक शख्श और भी है अपनी, जो बेच के मेहनत जीता है
भूखी रातों में नींद की खातिर, बेबस पानी पीता है
मजदूर वो जिसने दिन भर पत्थर तोड़े, ईंटें ढोई हैं
हस्ती को बनाये रखने को, पल-पल मरता रहता है

बस ये ही नहीं लाचार दौरे-सरमाया से बल्कि लाखों
हैं और भी मुल्क की सड़कों पे, पेशा-ए-गदाई करते हैं
चाहे कितनी तरकीब करें, तस्कीं उनकी किस्मत में कहाँ
बेबस हैं फ़रेबे-ज़रदारी के सामने, क्या कर सकते हैं

और आखिर में हर बार वही, किस्सा दोहराया जाता है
घूंघट में लिपटी बेटी की चौराहों पे कीमत लगती है
अपनी ही नीलामी के लिए, ख़ुद जहाँ पे औरत सजती है
हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बिकती है...
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सुर्ख़ी : लाली 
गर्दू : आसमान
दहकां : किसान
इफ़लास-जदा : गरीबी के मारे
गंदुम: गेंहू
माजी : बीता कल
फर्दा : आने वाला कल
मलबूस : वस्त्र 
गदाई : भीख माँगना
ज़रदारी : दौलत  

10 comments:

  1. विचारणीय पोस्ट। सार्थक रचना।

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  2. बहुत खूबसूरत प्रस्तुति |
    बधाई स्वीकारें ||

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  3. आज के यथार्थ को राच्न्हा में उतार दिया ... बहुत खूब ... लाजवाब ...

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  4. Beautifully Expressed..!!!...

    Heart Touching.... Many Congrats! :)

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  5. आप सभी का सराहने के लिए धन्यवाद !

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  6. Expression of truism in this poem is appreciable,we really need a change.
    Seema

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  7. wow pushpendra really heartwrenching..appreciate the sentiments

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  8. Sahir reincarnated in Sahil.Being a big fan of Sahir,I , hereby accept you as a gurubhai.Marhaba.

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